नारी सशक्तिकरण 👩‍✈️👮‍♀️👩‍💻👩‍🎓👩‍🏫

#women #empowerment

सशक्तिकरण से तात्पर्य व्यक्ति की उस क्षमता से जिसके अन्तर्गत वह अपने जीवन से जुड़े सभी निर्णय खुद ले सकता है ।महिला के सन्दर्भ में भी ये ही लागू होता है कि वो परिवार व समाज के सभी बंधनो से मुक्त होकर अपने जीवन से जुड़े निर्णयों की निर्माता स्वयं हो।

ढोल,गवार,क्षुद्र,पशु नारी,

सकल ताड़ना के अधिकारी ।

से………………….give us good women’s we will have a great nation.

तक नारी ने एक लम्बी वैचारिक यात्रा तय की है । कभी देवी के रूप में वन्दनीय तो कभी दासी के रूप में तिरस्कृत,क्या नारी कभी भी समानता की स्थिति नही पा सकी है ?

क्यो स्त्री के नैसर्गिक व्यक्तित्व का हनन हर सभ्यता का नैतिक खेल रहा है? इस प्रश्न का उत्तर क्या पुरूष के स्त्री की जैविक सीमाओं से मुक्त होने में है,अधिक बल शाली होने मे है,अधिक योग्य होने मे है अथवा स्त्री को सम्पत्ति समझना,एक निम्न प्रजाति का समझने में है अथवा यह अहं का प्रश्न है?

उल्लेखनीय है कि सभ्यताओं के स्वर्ण युग व अन्ध युग की तरह स्त्रियों के जीवन में भी इसी प्रकार का समय आया है ।वैदिक काल में स्त्री को सभी अधिकार प्राप्त थे लेकिन मध्य काल मे वे सीमित हो गए और ये लैंगिक भेद दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है । जहा भारत में पुरूष साक्षरता दर 81.3 % है वहीं स्त्री साक्षरता दर 60.6% है ।अतः

अनुच्छेद-14 को सुनिश्चित करने के लिए नारी सशक्तिकरण सबसे प्रभावशाली उपाय है । इसके लिये महिला आरक्षण बिल-108 संविधान संशोधन का पास होना बहुत जरूरी है,ये संसद मे महिला की 33% हिस्सेदारी को सुनिश्चित करता है । जिससे प्रत्येक क्षेत्र मे महिला अपना विकास कर सकेगी।

हालांकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के द्वारा सराहनीय प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन फिर भी नारी अशिक्षा , अस्वास्थ्य,असमानता आदि समस्याओं से आज भी घिरी हुई है और सबसे ज्यादा अपने ही परिवार से हतोत्साहित है ।

अतः भारत मे नारी को सशक्त बनाने के लिये सबसे पहले समाज मे उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले उन सभी राक्षसी सोच को मारना होगा जैसे – अशिक्षा,दहेज प्रथा, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा,भ्रूण हत्या,यौन हिंसा,असमानता,ब्लात्कार,वैश्यावृत्ति ,मानव तस्करी आदि ।

संसद द्वारा दहेज रोक अधिनियम 1961,अनैतिक व्यापार अधिनियम-1956,मेडिकल तमनैर्श्ं आफ प्रेग्नेंसी एक्ट-1987,बाल विवाह रोकथाम अधिनियम-1994,कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम-2013। आदि पारित कर अपने स्तर पर एक पहल की है अब आवश्यकता है तो हमें कुछ करने की अर्थात् इन कानूनों को व्यवहार

में लाने की।क्योकिं तभी सही मायनों मे नारी सशक्तिकरण हो पायेगा।नारी की महिमा को व्यक्त करते हुए तो जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा है कि ..………………”लोगो को जगाने के लिये महिलाओं का जागृत होना जरूरी है।एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है,परिवार आगे बढ़ता है,गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है ।*******************************

39 Comments

  1. This was nicely written 🙂
    Though the word limit is 150 only per question

    U r getting likes but hardly any comments harsh truth of this platform

    Read to write 🙂
    avoid writing data …in exam after preparing 60 subjects you will hardly remember any data

    No data is better than wrong data.

    You did well 🙂

    Liked by 3 people

      1. Yes write your point of view. ..decision making ability ur thought process. .. that is what expected from aspiring bureaucrats ….

        Btw you wrote beautiful 🙂 like a 1930 hindi pure sahitya …kudos to you

        Liked by 2 people

      1. achi bat hai.. hum sabhi ko samjhna chaye ye or sabki bhen beti maa ko apni bhen beti maa smjhna chayei . agr aisa ho toh hi sabka bhala hai

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  2. नारी को कमज़ोर कहता कौन है मै मैम?
    क्या नारी सचमुच कमजोर है?
    नारी का दुश्मन पुरुष सामाज है क्या?
    बिल्कुल झूठ…
    नारी का ना तो पुरुष सामाज दुश्मन है, ना ही नारी कमज़ोर है। नारी सशक्तिकरण की अधिकता इतनी ज्यादा हो चुकी है कि यह अपने सशक्तिकरण का सही उपयोग करने की बजाय इसका इस्तेमाल कर रही है।
    किसी एक बेवकूफ़ ने नारी समाज को भला बुरा क्या कह दिया तो सारा पुरुष सामाज गन्दा साबित कर दिया, आप किताबी बातों को छोड़ कर अगर गहराई से देखें तो पुरुष की तस्वीर कुछ और नजर आएगी।
    इस बात पर खास ध्यान दें कि मैं आपको जा नारी सामाज को भला बुरा कहने के हक्क में कतई नहीं हूँ, बल्कि जो नारी /पुरुष – नारी /पुरुष का गंदा खेल चल रहा है उस पर चरचा कर रहा हूं।

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    1. जी मै आपके विचारों से सहमत हूं।पर गहराई से देखने पर आज भी ऐसा प्रतीत होता है कि नारी को आज भी अपना हक नहीं मिला है,आज भी घरेलू हिंसा,बलात्कार ,जैसी खबरों से अखबार का हर पेज भरा पड़ा है। हा मानती हूं कुछ नारियों ने इसका गलत इस्तेमाल किया पर इसका ये मतलब तो नहीं ना के हर नारी ने ऐसा किया है।और हा साहब अपवाद तो हर जगह मिलते है फिर चाहे बात पुरुष की हो या नारी की…हक लेना उनका अधिकार है…और ये उन्हें दिया नी का रहा वो खुद अपने बलबूते पर ले रही है।और फिर जैन धर्म का स्यादवाद का नियम तो कभी ना कभी अपने देखा होगा।
      मै ये नहीं बिल्कल नहीं कहती के हर पुरुष गुनेगाहर है…..पर क्या आपको भी लगता जिन्दगी रूपी गाड़ी के चलने के लिए दोनों पहियों का साथ चलना जरूरी है।

      मै माफी चाहूंगी अगर मेरे शब्दों से आपको ठेस पहुंची हो तो…..पर plz ek vari mere vicharo pr vichar jrur kriyega😊😊😊😊

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      1. मुझे आप की बात ठेस नहीं पहुँचा रही मैम, और मैं जैन धर्म के बारे में भी कुछ नहीं जानता। मैं सिरफ और सिरफ अपने आसपास के माहौल पर नजर दौड़ा कर ही आपसे अपना तजुर्बा बांट रहा हूं। हालांकि सभी नारी/पुरूष एक जैसे भी नहीं होते। कुछ अच्छे भी मौजूद हैं इस संसार में। फिर भी अगर मैं एक नजर दौडायूं तो पुरुष सामाज उतना भयानक नहीं है जितना कि नारी सामाज। आप अखबारों की बात करते हो नां। हां, वोह सभ गलत हो रहा है। अगर मैं बात करूं कि कोरट कचहरी चले और देखें, कि जितने भी केस औरतों नें मर्दों पर लगा रखे हैं उनमें से 95% झूठे हैं। और सुनिए, सभी नहीं पर काफ़ी लडकियां लडकों से सहमति से संबंध बनाती हैं,अपनीं मर्जी से घर से भागती हैं। बात नां बनने पर या पकडे जाने पर घरवालों के दबाव में आकर लडके पर ही बलात्कार का केस थोपती हैं। हक लेना बिलकुल अधिकार है, हक उनको दिलाना चाहिए जिनका हक्क छिन्न गया हो। पूरी जाती की आड ले, समस्त जाती को कमजोर दिखा दिखा कर हक्क लेना भी पाप ही है।
        औरतों को कितनी आजादी चाहिए?
        आप tik tok चला कर देखो, vigo चलाकर देख लो। 80% औरतें वहां पर बदन की नुमाइश करती हैं। कोई अपना कुछ दिखा रही कोई कुछ। उनको देखकर किसका दिमाग नहीं हिलेगा? उकसाती खुद हैं और खुद ही इल्ज़ाम भी। वाह जी वाह।
        क्या क्या बताएँ अब आपको, औरत कुछ कमजोर नहीं है, ना उसे हमने कभी दबाया है। वो ज़माने गए। बहुत से मर्द पिता ऐसे मिल जाएंगे आपको जो कहते हैं कि मुझे बेटी चाहिए। पुत्तर प्राप्ती की भूख औरत में ज्यादा मिलेगी। चाहे वो जननी हो जा जननी की सास जा जननी की माता। बहुत से मर्द इस सोच से आज़ाद मिलेंगे आपको।
        आखिर में, औरत भगवान का दूसरा रूप है जो कुदरत की रचना को आगे बढ़ाती है। मौत से लड़कर बच्चों को जन्म देती है। हम इसकी इस शक्ति के आगे कुच्छ भी नहीं। लज्जा, ममता, धैर्य, नरमाई औरत का गुण भी है और सिंगार भी। अगर वो यह गुण भूलेगी तो मर्द /औरत में कुछ शरीरक अंगों और दाड़ी मूँछों का ही अन्तर रह जाएगा। बाकी कुछ नहीं।
        ज्यादातर मर्द औरत का झगड़ा यह है, कि औरत वहाँ जुबान चलाती है जहां चुप रहना चाहिए। यहां बोलना हो वहां चुप रहती है।
        मर्द क्या है?
        गधा है।
        पूरा जीवन ग्रहस्थी का बोझ उठा के चलता है। और कुछ नहीं।
        आप अपने उपर ही नजर मार लीजियेगा, आप भी नारी हो। आप पर कितनी पाबंदियां हैं?
        आपको उतना प्यार आपकी माता जी नहीं करती होंगी जितना आपके पापा।
        खैर छोड़िए, ज्यादा लम्बा हो जाएगा।
        धन्यावाद, और माफ़ी.. 🙏💐

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      2. जी अपवाद है जगह होते है। और मैं भी मानती हूं के आज नारी कदम कदम से कदम मिला पा रही है तो कहीं ना कहीं पुरूष का बहुत बड़ा रोल है।कभी पिता के रूप में री कभी भाई के रूप में कभी दोस्त के रूप में तो कभी जीवनसाथी के रूप में।पर अभी भी बदलाव की जरूरत ही समाज को । नज़रिया और नजर दोनों में बदलाव ही समय की मांग है और ये बदलाव आप , मैं और हम सब मिलकर ही का सकते हैं क्योंकि एक पहिए के बिना जीवन रूपी गाड़ी का सुचारू रूप से चलना असंभव है।☺️☺️☺️

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