कुछ करके देखते हैं 🥀🥀🥀

चलो खुदा पर नहीं आज,

अपनी खुदी पर एतबार करके देखते हैं।

बहुत पढा़ है लोगों के जीवन को,

चलो आज अपनी कहानी खुद लिखकर देखते है।

छोटे थे तब पापा ने सिखाया,

सिखाते सिखाते हमारी जिंदगी के,

फैसलो पर उनका राज पाया।

बड़े हुए तो भाई ने अधिकार जताया,

क्या हमनें खुद को खो दिया ..?

ये आज तक समझ न आया।

लो चलो आज इसी बहाने,कुछ नया,

कुछ बड़ा करके देखते हैं।

दुनिया के लिए नाकारे तो थे ही,

चलो आज निकम्मा बनकर भी देखते हैं।

चलो कुछ अधूरे ख्वाबों को पूरा करके देखते हैं।

खूब बताया लोगों ने कदम कदम पर उनका नजरिया,

चलो आज उन्हें अपने नजरिये से अवगत करवाकर देखते हैं।

पढ़ा है वैसे तो खूब इतिहास हमनें,

पर चलो आज नया इतिहास रचकर देखते हैं।

दुनिया ने ठुकरा दिया तो क्या,

हम दुनिया को अपनाकर देखते हैं।

औछी हरकतों से क्या होता है,

चलो हम बडप्पन दिखाकर देखते हैं।

रह गए अपने ख्वाब अधूरे तो क्या,

चलो किसी अनजान, अजनबी के

,ख्वाबों का हिस्सा बनकर देखते हैं।**************”***”********””*””*****

औकात के स्थान पर नजरिया ब्लॉगर Divya singh की सलाह पर किया गया है।

72 Comments

  1. अकेले सफ़र करना पड़ता हैं इस जहां में कामयाबी के लिए…

    काफिला, दोस्त और दुश्मन अक्सर कामयाबी के बाद ही बनते हैं !!!! 🙂 🙂
    sabdo me badbolapann jyada hai shayad ya kah lo gussa hai….neeras rachana nahi hai …. baaki rhyming badhiya hai dost 🙂

    Liked by 3 people

    1. Ha gussa to bhut h dear pr ab is gusse ko hi positive energy me convert krna h Or क्योंकि मेरे प्यारे दोस्त ने कहा है कि अकेले सफर करना पड़ता है इस जहाँ में कामयाबी के लिये। तो फिर हम अकेले सफर भी करेंगे और बाद में काफिला भी बनायेंगे 😊😊BTW happy rakhi and 🇮🇳🇮🇳🇮🇳 independence Day

      Liked by 1 person

  2. बहुत खूबसूरत कविता है, तुकबंदी भी बहुत अच्छे से तराशी हुई है | ऐसे ही खूबसूरत कवितायें लिखते रहिये |

    Liked by 3 people

  3. Awesome thought and poem,
    औकात की जगह नज़रिया का उपयोग करना ज्यादा अच्छा होगा। Just giving a suggestion as aukaat is kind of more tough and going out of poem rythm.

    Liked by 2 people

  4. मेरा शब्द ज्ञान बहुत सीमित है इसलिये या तो मैं अर्थ नहीं समझ रहा या आपका आशय नहीं समझ रहा , मुझे इस कविता में ये दो लाइनें बाकी कविता से  मेल खाती नहीं लग रही | 
    “दुनिया के लिए नाकारे तो थे ही,
    चलो आज निकम्मा बनकर भी देखते हैं।”
    आपकी यह कविता भी आपकी अन्य रचनाओं की तरह बेहतरीन है | 
    नोट : मेरा आलोचना  का इरादा कतई नहीं है | 

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    1. जी मेरा आशय है कि लोगो ने हमेशा हमे खा ह किव्तुं कुछ नही कर सकती ।इसलिए आज जब उनकी बनायी परिपाटी से ऊपर उठकर कुछ करेंगे तो वो हमे निक्म्मा ही कहेंगे ।

      और शुक्रिया आपने पूछा अगर कुछ गलत लिखा हो तो आप बिना झिझक बता सकते हो। हम गलतियो से ही तो सीख पाते है ।🙂

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  5. बहुत खूब ..

    खुद को खुद से मिला रहा हूँ, अपना परिचय बना रहा हूँ,
    क्योंकि कोई और ना साथ देगा, अगर ख़ुदी को बुलंद ना की.

    madhukosh.com

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