झोपड़पट्टी का जीवन 😑😑

टी.वी.और अखबारों में रोज सुनने में आ रहा है,

कि देश का विकास तेजी से होता जा रहा है।

फिर क्यों दुनिया के हर कौने में, कहीं न कहीं,

कोई आम आदमी झोपड़पट्टी पर ,

अपना जीवन गुजार रहा है।

अगर सरकार के वादे है, तरक्की और विकास,

तो फिर क्यों? Slums में बचपन बढ़ता जा रहा है।

माना सरकार वादे भी करती है,

और कुछ हद तक उन्हें पूरा भी करती है।

आवास योजना भी आती है ,

और साथ में उज्जवला भी लाती है।

पर फिर भी उन गरीबों के हिस्से,

झोपड़पट्टी ही थी और वो ही रह जाती है।

न कोई योजना उन तक पहुँच पाती है,

और न उनकी जिंदगी बद से बेहतर हो पाती है।

हाँ प्रतिभाएँ तो खूब जन्म लेती है यहाँ,

पर अवसर के अभाव में वो भी दब सी जाती है।

भाग्यवश कभी सरकार की तो कभी किसी NGO की,

निगाह इन पर पड़ भी जाती है।

पर उनकी मदद भी कुछ वक्त के बाद रूक सी जाती है

छोटी सी चीज में खुशी ढूंढ लेते हैं यहाँ के बच्चे,

साहब अमीरों से शौक नहीं है इनके।

फिर भी न जाने क्यों…………?

विकास की आड़ में,

सबसे पहले इनकी ही दुनिया उजाड़ दी जाती है।

37 Comments

  1. Beautiful poem Girija. I feel so deeply for these children or any child on the road begging or selling things. And you right, no progress for them. Its just so sad.

    Liked by 3 people

  2. पूर्ण सहमत…
    मेरा भारत महान, लेकिन अब इसकी बागडोर चोरों के हाथ में है।
    मुझे लगता है कि गोरों के गुलाम बने रहना ही अच्छा था इन कालों की आज़ादी से।

    Liked by 1 person

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