वृद्धावस्था एक अनकही कहानी 😔

मंजिल की चाह हमें ,

शहर की गलियों तक ले ही आयीं।

जहाँ हर तरफ सडकों पर रोशनी ही नजर आयीं,

पर सिर्फ सडकों पर,

घरों में तो फिर भी कालिमा ही नजर आयीं।

ना किसी बच्चे की खिलखिलाहट,

ना किसी बुजुर्ग की आहट सुनने में आयीं।

नजर आया न कोई बुजुर्ग अपने ही घर में,

बोझिल समझ बैठे उसे उसके ही अपने।

जिंदगीभर जिनकी ख्वाहिशों के लिए यत्न किये,

उन्हीं बूढ़े हाथों के लिए,

किसी ने ना कोई प्रयत्न किये।

जब से घर बेटे का हुआ,

तब से वो बुजुर्ग बेघर सा हुआ।

अरे ख्वाहिशें तो दूर इनकी तो ,

जरूरतें भी उन्हें महंगाई लगी।

ना कर सके वो उनका कर्ज अदा,

जिन माँ-बाप ने सन्तान को हर सुख देना ही,

समझा अपना फर्ज सदा।

होकर बेघर उस बुजुर्ग ने,

मजबूरन वृद्धाश्रम में पनाह पायीं।

बैगाने लोगों ने ही उसे खुशियाँ दिलाई।

हर वक़्त याद करता है वो बुजुर्ग,

अपने उस जवान बेटे को।

जिसके नन्हें कदमों से ,

घर में पहली बार खुशियाँ आयीं।

लोग कहते हैं, बहु बेटे ही निर्दयी होतें है,

दया तो हमेशा बेटी को ही आयीं।

पर विचारणीय यह है……………… कि

किसी की बेटी ही तो किसी की बहु कहलायी।

फिर क्यों वो बूढ़े सास ससुर को अपना न पायी।

समय गुजरा, वक्त बदला,

अब बारी बेटे- बहु की भी आयीं।

जब बुढ़ापे ने दस्तक दी उन तक,

तब उन्होंने भी शरण वृद्धाश्रम की ही पायीं।

हुआ उन्हें अब अपनी गलती का ऐहसास,

पर अफ़सोस तब तक उस बुजुर्ग को,

मौत आ चुकी थी भाई।

33 Comments

  1. बहुत खूब… दिल छू लिया तुम्हारी कविता ने तो 🙂 और यह हमारे समाज का कटु सत्य है 😣😣

    Liked by 2 people

    1. हाँ आपने सही कहा ये हमारे समाज का कटु सत्य है जिसे बदने के लिए हमें कदम बढाना ही होगा।

      Liked by 1 person

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